बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रही
शुरू अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है।
Roza Kholne Ki Dua – सही हदीस के मुताबिक | रोज़ा खोलने की दुआ
रमज़ान का महीना बरकतों और रहमतों से भरा होता है, और इसमें रोज़ा (इफ्तार) खोलने की दुआ पढ़ना सुन्नत से साबित है। इस आर्टिकल में हम जानेंगे Roza Kholne Ki Dua, इसका अरबी में उच्चारण, तर्जुमा और सही तरीका जिससे नबी करीम ﷺ रोज़ा खोलते थे।
रोजा खोलने की दुआ (Roza Kholne Ki Dua in Arabic & Tarjuma)
Roza Kholne Ki Dua In Arabic
Zahabaz-zama’ u wabtallatil uruqu wa sabatal-ajru in-sha-Allah
Roza Kholne Ki Dua Tarzuma
प्यास खत्म हुई, रगे तर हो गयी और रोजे का सवाब इंशाअल्लाह पक्का हो गया.
यह दुआ नबी करीम ﷺ से साबित है और यह हमें इफ्तार (रोज़ा खोलने) के समय पढ़ने की सलाह दी जाती है। इस दुआ में हमारी प्यास और थकावट के खत्म होने के बाद अल्लाह के साथ हमारी इबादत और सवाब की आशा का जिक्र किया गया है।
दुआ कब करनी चाहिए? (Dua Kab Kare)
1. दुआ करने का सबसे बेहतरीन समय
इफ्तार के वक्त दुआ करने का सबसे बेहतरीन समय होता है। नबी ﷺ ने फरमाया कि रोज़ेदार की दुआ इफ्तार के वक्त जरूर कबूल होती है। इसलिए इस समय हमे हर तरह की हलाल दुआ करनी चाहिए। अल्लाह से हर चीज़ की अच्छाई की दुआ करनी चाहिए।
❝ रोज़ेदार की दुआ इफ्तार के वक्त नामंज़ूर नहीं होती। ❞
(तिर्मिज़ी: 2525)
2. बिस्मिल्लाह पढ़कर खजूर या पानी से रोज़ा खोलें
नबी ﷺ का तरीका था कि वह रोज़ा खजूर से खोलते थे। खजूर में बहुत सी ताजगी और बरकत होती है, जो शरीर को ऊर्जा देती है। यदि खजूर न हो तो पानी से रोज़ा खोलना भी सुन्नत है। यह भी इस्लाम में एक बेहतर तरीका है। रोज़ा खोलने से पहले “बिस्मिल्लाह” कहना न भूलें।
3. रोज़ा खोलने के बाद यह दुआ पढ़ें
ज़हबज़-जमाअू वअब्तलातिल उरूकू व सबत अल-अज्रू इंशा-अल्लाह
रोज़ा खोलने की गलतफहमियां (Common Misconceptions)
1. एक और दुआ भी है?
⚠️ कुछ लोग इफ्तार के लिए एक और दुआ पढ़ते हैं, लेकिन वह हदीस ज़ईफ़ (कमज़ोर) है। इसलिए, हमें वही दुआ पढ़नी चाहिए जो नबी ﷺ से साबित है।
2. शहरी की दुआ?
⚠️ कई लोग रोज़ा रखने के लिए “Roza Rakhne Ki Dua” पढ़ते हैं, लेकिन हदीस में ऐसा कुछ साबित नहीं है। नबी ﷺ ने सिर्फ दिल में नियत करने को कहा, जुबान से नियत बोलना जरूरी नहीं।आजकल कुछ लोग रोज़ा रखने के लिए “Roza Rakhne Ki Dua” का अभ्यास करते हैं, लेकिन हदीस में ऐसा कोई बयान नहीं है। रोज़ा रखने के लिए नबी ﷺ ने सिर्फ दिल से नियत करने की सलाह दी है, और जुबान से नियत बोलने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए हमे अपनी नियत दिल से करना चाहिए।
रोज़ा खोलने की दुआ का महत्व (Importance of Roza Kholne Ki Dua)
रोज़ा खोलने के वक्त पढ़ी जाने वाली दुआ केवल एक शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह हमारी आत्मा को ताजगी और राहत देती है। जब हम यह दुआ पढ़ते हैं, तो हम अपनी प्यास, भूख और शरीर की थकावट के समाप्त होने की कामना करते हैं। इसके साथ ही यह दुआ हमारे सवाब को भी पक्का करती है। यह हमें याद दिलाती है कि रोज़ा खोलने से पहले अल्लाह से सच्चे मन से दुआ करनी चाहिए और उसके बाद सही तरीके से इफ्तार करना चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion)
आज हमने Roza Kholne Ki Dua और इफ्तार का सही तरीका सीखा। रोज़ा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की इबादत और तक़वा (परहेज़गारी) का बेहतरीन जरिया है।
❝ अल्लाह हमें सही अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए, रमज़ान की बरकतों से नवाजे, और हमें गलतफहमियों से बचाकर सही दीन पर चलने की हिम्मत दे – आमीन! ❞
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